शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

मधुश्रावणी

******मधुश्रावणी*****
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चलू चलू सखिया
लोढ़ब सुमन मन भरि
भरि भरि डलिया
चलू चलू सखिया।


चम्पा चमेली बेली फुलायल
जाही जूही अड़हुल
लोढ़ि लोढ़ि लायब
गेना गुलाब सँ डाला सजायब
हर्षित पूजब पशुपति-प्रिया।
चलू चलू सखिया•••••


चलू चलू घूमब गामक सिमान तक
बाट-घाट वन-वन अपन ठेकान तक
नेनपन बिताओल जतय खेल-खेल कय
धारक कछेर फेर,पोखरि मे हेल कय
से जेती गाम छोड़ि
आब ई धिया ।
चलू चलू सखिया•••••


दू-चारि दिना आओर बेश

चलू चहकि ली
चानन सन माटि लोटि
नीर निर्मल उमकि ली
सुरभित पवन संग
अंग-अंग गमकि ली
नहि जानि ककरा के
पुनि भेटब कहिया।
चलू चलू सखिया•••••


साओन त बहुतो बिताओल हे बहिना
रिमझिम फुहार त आयल छल अहिना
मधु-मातल मुदा एहन उन्मादक
तन तरंगित मन आह्लादक
अनुभव नहि एहन सन
नहि सपनहु देखिया ।
चलू चलू सखिया••••••


हे पान, गुलाब हे मिलन हे बहिना
सरस सोहाओन मधुश्रावण महिना
एहन निर्मोही निर्दैया नहि हेता
अओता अबस्से अहूँक पिया ।
चलू चलू सखिया••••••••
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