हारा नहीं मैं
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डगमगाया हूंँ मगर, हारा नहीं मैं
कर रहा संघर्ष, बेचारा नहीं मैं
है हमें विश्वास, अपनी मेहनत पे
जूझता हूँ देख, आवारा नहीं मैं
सख़्त ऊपर से मगर, भीतर मुलायम
चालबाजों के लिए, प्यारा नहीं मैं
जानता अच्छी तरह, औकात अपनी
आम इक इंसान हूंँ, न्यारा नहीं मैं
फ़र्क जिसकी ज़िन्दगी में, कुछ न आया
हूंँ हक़ीक़त आज का, नारा नहीं मैं
खोल आंँखें देखता हूंँ, रंग दुनिया
इसलिए तो आंँख का तारा नहीं मैं
बुद्धि के हीं साथ दिल की, बात सुनता
आत्मा को भी कभी, मारा नहीं मैं
जो सफलता साथ मिल,हासिल किया हो
वो कभी भी श्रेय लूँ, सारा नहीं मैं
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